Nepal Flood: बार-बार क्यों डूब रहा नेपाल? 10 बड़ी वजहें आईं सामने
नेपाल में एक बार फिर प्राकृतिक आपदा ने भारी तबाही मचाई है। बाढ़, भूस्खलन और मलबे के तेज बहाव ने कई इलाकों में सड़कों, पुलों और जरूरी...

नेपाल में एक बार फिर प्राकृतिक आपदा ने भारी तबाही मचाई है। बाढ़, भूस्खलन और मलबे के तेज बहाव ने कई इलाकों में सड़कों, पुलों और जरूरी बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया। हादसे के बाद मृतकों का आंकड़ा करीब 300 तक पहुंचने की खबर है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
शुरुआती जानकारी में इस तबाही को भूकंप से जोड़कर देखा गया था। हालांकि बाद में सामने आए सैटेलाइट डेटा और भूगर्भीय विश्लेषण में ग्लेशियर या बर्फ के बड़े हिस्से के टूटने और उसके साथ मलबे के तेजी से नीचे आने की संभावना सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि नेपाल में भूकंप, बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी आपदाएं इतनी बार क्यों सामने आती हैं?
नेपाल की भौगोलिक स्थिति और बदलती जलवायु इसके पीछे बड़ी वजह हैं। आइए 10 प्वाइंट्स में समझते हैं कि हिमालयी देश नेपाल प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से इतना संवेदनशील क्यों है।
1. दो टेक्टोनिक प्लेटों के बीच स्थित है नेपाल
नेपाल ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं। भारतीय प्लेट करीब 20-21 मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से यूरेशियन प्लेट की दिशा में बढ़ रही है। इन प्लेटों की लगातार टक्कर से हिमालय के नीचे भूगर्भीय दबाव बना रहता है। यही वजह है कि नेपाल भूकंप के लिहाज से दुनिया के संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है।
2. ऊंचे पहाड़ और खड़ी ढलान
नेपाल का बड़ा हिस्सा हिमालयी क्षेत्र में आता है। यहां पहाड़ अपेक्षाकृत नए और भूगर्भीय रूप से सक्रिय हैं। कई जगहों पर ढलान बेहद खड़ी हैं और चट्टानों की स्थिरता भी सीमित है। ऐसे इलाकों में भारी बारिश, भूकंप या बर्फ पिघलने जैसी घटनाएं होने पर जमीन खिसकने का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
3. तेजी से गर्म हो रहा हिमालय
जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। ICIMOD के हालिया आकलन के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद इस क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। इससे भविष्य में ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों के कारण अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
4. ग्लेशियल झीलों का बढ़ता खतरा
ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ी इलाकों में कई ग्लेशियल झीलें बनती हैं। इन झीलों में बड़ी मात्रा में पानी जमा होता रहता है।
यदि किसी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाए या उसमें अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा पहुंच जाए, तो नीचे की ओर बेहद तेज बाढ़ आ सकती है। नेपाल के प्रमुख नदी बेसिनों में ऐसी कई ग्लेशियल झीलों की पहचान की जा चुकी है।
5. ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों का टूटना
हिमालय में सिर्फ ग्लेशियरों का पिघलना ही खतरा नहीं है। बर्फ, चट्टान या ग्लेशियर का कोई बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर जाए तो उसके साथ भारी मात्रा में मलबा भी बह सकता है। ऐसे मलबे की रफ्तार बहुत तेज होती है और रास्ते में आने वाले घर, सड़क, पुल और दूसरी संरचनाएं कुछ ही समय में इसकी चपेट में आ सकती हैं।
6. मॉनसून की भारी बारिश
नेपाल में मॉनसून के दौरान कई इलाकों में भारी बारिश होती है। लगातार बारिश से पहाड़ों की मिट्टी में पानी की मात्रा बढ़ जाती है और ढलानों की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। इसके बाद भूस्खलन, नदियों में अचानक उफान और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। बारिश अगर कम समय में बहुत ज्यादा हो जाए तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
7. नदियों की संकरी घाटियां
नेपाल की कई प्रमुख नदियां पहाड़ों के बीच संकरी और गहरी घाटियों से होकर गुजरती हैं। बाढ़ का पानी जब इन घाटियों में तेजी से पहुंचता है तो उसके फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती। नतीजतन पानी और मलबा तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है। इसी कारण पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ बेहद विनाशकारी साबित हो सकती है।
8. सड़क और निर्माण कार्य से बढ़ता जोखिम
नेपाल में सड़क, पुल, हाइड्रोपावर और दूसरी परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में निर्माण करना आसान नहीं होता। कई बार सड़क बनाने के लिए पहाड़ों की कटाई और ढलानों में बदलाव करना पड़ता है। इससे प्राकृतिक रूप से कमजोर ढलानों पर दबाव बढ़ सकता है और बारिश के दौरान भूस्खलन की आशंका बढ़ सकती है।
9. बस्तियां और इंफ्रास्ट्रक्चर जोखिम वाले इलाकों में
नेपाल में समतल जमीन सीमित होने के कारण कई बस्तियां, सड़कें और दूसरी सुविधाएं नदी घाटियों या पहाड़ों की ढलानों के आसपास विकसित हुई हैं। समस्या यह है कि यही क्षेत्र बाढ़ और भूस्खलन के प्राकृतिक रास्ते भी हो सकते हैं। ऐसे में आपदा आने पर लोगों के साथ-साथ सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं और दूसरे बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचता है।
10. आपदा के बाद राहत और बचाव भी चुनौती
नेपाल की भौगोलिक स्थिति आपदा के बाद राहत अभियान को भी मुश्किल बना देती है। भूस्खलन से किसी इलाके को जोड़ने वाली सड़क बंद हो सकती है और पुल टूटने से पूरा क्षेत्र बाकी हिस्सों से कट सकता है। ऊंचे पहाड़, खराब मौसम और भारी मलबे के कारण राहत दलों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में समय लगता है। यानी नेपाल में भौगोलिक परिस्थितियां आपदा के असर को बढ़ाने के साथ-साथ बचाव अभियान को भी चुनौतीपूर्ण बना देती हैं।
एक नहीं, कई वजहों से बढ़ता है खतरा
नेपाल में प्राकृतिक आपदाओं के पीछे कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। यहां भूकंपीय गतिविधि, ऊंचे और अस्थिर पहाड़, भारी मॉनसून, ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलें और तेजी से बढ़ता निर्माण—कई जोखिम एक साथ मौजूद हैं।









