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गुरु पूर्णिमा 2023 : भारतीय संस्कृति में क्यों है गुरु पूर्णिमा का इतना महत्व

गुरु पूर्णिमा आषाढ़ (जून-जुलाई) की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन वेदों के संकलनकर्ता और महभारत के रचियता महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था।

आज यानी 3 जुलाई 2023 को गुरु पूर्णिमा है। गुरु पूर्णिमा सिर्फ भारत ही नहीं वरन नेपाल और भूटान में भी मनाया जाता हैं। साथ ही दुनियाभर में हिन्दुओं के साथ-साथ जैन और बौद्ध अनुयायियों में के बीच इसका विशेष महत्व हैं। इस दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति पूज्य भाव से कृतज्ञता प्रदान और आशीर्वाद ग्रहण करता है, क्योंकि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है। भक्त कवि कबीर ने तो गुरु को ईश्वर से भी अधिक महत्व देते हुए, कहा है-

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

तो कवि अमीर खुसरो ने अपने गुरु की मृत्यु की खबर पाकर अनुभव किया कि मानो पूरी दुनियां ही अंधकारमय हो गयी हो। कहा जाता है कि गुरु की मृत्यु के बाद उन्होंने यह आखरी शेर कहकर दुनियां छोड़ दी-

गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल ख़ुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस॥

तो वहीं स्कन्द पुराण के गुरुगीता (पूरा अध्याय गुरु को समर्पित) के गुरु-स्त्रोतम में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सामान बताया गया हैं। उन्हें साक्षात् परब्रह्म कहा गया है-

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

गुरु का अर्थ-

गुरु ही, मनुष्य को ‘अंधकार से प्रकाश’ की ओर तथा ‘अज्ञान से ज्ञान’ की ओर ले जाते हैं। संस्कृत शब्द ‘गुरु’ का शाब्दिक अर्थ भी होता हैं- अंधकार को दूर भागने वाला (Dispeller of darkness).

ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यता-

गुरु पूर्णिमा आषाढ़ (जून-जुलाई) की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन वेदों के संकलनकर्ता और महभारत के रचियता महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्हें आदिगुरु का स्थान प्राप्त हैं और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। बौद्ध अनुयायियों का मत हैं कि गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ के पूर्णिमा) के दिन ही भगवान् बुद्ध ने सारनाथ में संघ की स्थापना कर, पहला उपदेश दिया था। इसलिए बौद्ध अनुयायियों के बीच यह दिन विशेष महत्व रखता हैं।

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