धर्म

Aaj Ka Panchang 14 June: शिव मंदिर में भगवान शिव का रुद्राभिषेक करें

Aaj Ka Panchang 14 June: राहुकाल और शुभमुहूर्त के साथ जानें कैसे लगेगा कार्यस्थल पर मन और उन्नतिकारक कुंजियाँ

दिनांक 14 जून 2022

दिन – मंगलवार

विक्रम संवत – 2079

शक संवत – 1944

अयन – उत्तरायण

ऋतु – ग्रीष्म

मास – ज्येष्ठ

पक्ष – शुक्ल

तिथि – पूर्णिमा जून 13 रात्रि 09:03 से 14 जून शाम 05:21 तक

नक्षत्र – ज्येष्ठा शाम 06:32 तक तत्पश्चात मूल

योग – साध्य सुबह 09:40 तक तत्पश्चात शुभ

राहुकाल – शाम 04:03 से 05:45 तक

सूर्योदय – 05:54

सूर्यास्त – 07:26

दिशाशूल – उत्तर दिशा में

ब्रह्म मुहूर्त – प्रातः 04:30 से 05:12 तक

निशिता मुहूर्त – रात्रि 12.19 से 01:01 तक

व्रत पर्व विवरण – वटपूर्णिमा व्रत, कबीरदास जयंती, ज्येष्ठ पूर्णिमा

विशेष – पूर्णिमा के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है ।

(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)

वटपूर्णिमा व्रत ( गुजरात, महाराष्ट्र) 14 जून 2022

व्रत-विधि : इसमें वटवृक्ष की पूजा की जाती है । विशेषकर सौभाग्यवती महिलाएँ श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक अथवा मात्र अंतिम दिन व्रत-उपवास रखती हैं । यह कल्याणकारक व्रत विधवा, सधवा, बालिका, वृद्धा, सपुत्रा, अपुत्रा सभी स्त्रियों को करना चाहिए ऐसा ‘स्कंद पुराण’ में आता है ।

प्रथम दिन संकल्प करें कि ‘मैं मेरे पति और पुत्रों की आयु, आरोग्य व सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए एवं जन्म-जन्म में सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वट-सावित्री व्रत करती हूँ ।’

वट के समीप भगवान ब्रह्माजी, उनकी अर्धांगिनी सावित्री देवी तथा सत्यवान व सती सावित्री के साथ यमराज का पूजन कर ‘नमो वैवस्वताय’ इस मंत्र को जपते हुए वट की परिक्रमा करें । इस समय वट को 108 बार या यथाशक्ति सूत का धागा लपेटें । फिर निम्न मंत्र से सावित्री को अर्घ्य दें ।

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते । पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ।।

निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना कर गंध, फूल, अक्षत से उसका पूजन करें ।
वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः
यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले ।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मां सदा ।।

भारतीय संस्कृति वृक्षों में भी छुपी हुई भगवद्सत्ता का ज्ञान करानेवाली, ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव के जीवन में आनन्द, उल्लास एवं चैतन्यता भरनेवाली है ।

(ऋषि प्रसाद, जून 2007)

दरिद्रा देवी कहाँ निवास करती है ?

समुद्र-मंथन करने पर लक्ष्मीजी की बड़ी बहन दरिद्रा देवी प्रकट हुई । वे लाल वस्त्र पहने हुए थी । उन्होंने देवताओं से पूछा : “मेरे लिए क्या आज्ञा हैं ?”

तब देवताओं ने कहा : “जिनके घर में प्रतिदिन कलह होता हो उन्हीं के यहाँ हम तुम्हें रहने के लिए स्थान देते हैं । तुम अमंगल को साथ लेकर उन्हीं घरों में जा बसों । जहाँ कठोर भाषण किया जाता हो, जहाँ के रहनेवाले सदा झूठ बोलते हों तथा जो मलिन अंत:करणवाले पापी संध्या के समय सोते हों, उन्हींके घर में दुःख और दरिद्रता प्रदान करती हुई तुम नित्य निवास करो । महादेवी ! जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य पैर धोये बिना ही आचमन करता है, उस पापपरायण मानव की ही तुम सेवा करो ( अर्थात उसे दुःख-दरिद्रता प्रदान करो ) ।” ( पुद्मपुराण, उत्तर खंड, अध्याय २३२)

( हमारा आचार-व्यवहार व रहन-सहन कैसा हो यह जानने हेतु पढ़ें आश्रम से प्रकाशित सत्साहित्य ‘मधुर व्यवहार’ व ‘क्या करें, क्या न करे ?” )

 

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