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Aaj Ka Panchang 21 October: आज रमा एकादशी व्रत, जानें आज का शुभ योग

Aaj Ka Panchang 21 October: राहुकाल और शुभमुहूर्त के साथ जानें कैसे लगेगा कार्यस्थल पर मन और उन्नतिकारक कुंजियाँ

दिनांक – 21 अक्टूबर 2022
दिन – शुक्रवार
विक्रम संवत् – 2079
शक संवत् – 1944
अयन – दक्षिणायन
ऋतु – शरद
मास – कार्तिक (गुजरात एवं महाराष्ट्र में अश्विन मास)
पक्ष – कृष्ण
तिथि – एकादशी शाम 05:22 तक तत्पश्चात द्वादशी
नक्षत्र – मघा दोपहर 12:28 तक तत्पश्चात पूर्वाफाल्गुनी
योग – शुक्ल शाम 05:48 तक तत्पश्चात ब्रम्ह
राहु काल – सुबह 10:58 से 12:24 तक
सूर्योदय – 06:39
सूर्यास्त – 06:09
दिशा शूल – पश्चिम दिशा में
ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:59 से 05:49 तक
निशिता मुहूर्त – रात्रि 11:59 से 12:49 तक
व्रत पर्व विवरण – रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी, ब्रह्मलीन मातृश्री श्री महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस*
 विशेष – एकादशी तिथि में चावल खाना निषेध ।
*द्वादशी को पूतिका(पोई) खाने से पुत्र का नाश होता है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
 21 अक्टूबर 2022 – रमा एकादशी 
एकादशी 20 अक्टूबर शाम 04:05 से 21 अक्टूबर शाम 05:22 तक है । व्रत उपवास 21 अक्टूबर शुक्रवार को रखा जायेगा ।
 25 अक्टूबर 2022 – सूर्यग्रहण सम्बंधित महत्त्वपूर्ण बातें
 ग्रहण काल – 25 अक्टूबर शाम 04:30 से 06:06 तक
  सूतक काल – 25 अक्टूबर प्रातः 04:30 से ग्रहण समाप्त होने तक
 सूतक से पहले उपयोगी तुलसी पत्ता तोड़ने का समय – 24 अक्टूबर सोमवार को सूर्योदय के बाद 11:45 के बीच तुलसी पत्ता तोड़ के रख सकते हैं, इसके बाद तुलसी पत्ता तोड़ना निषेध है ।

 तुलसी पत्ते न हो तो कुश या तिल भी उपयोग कर सकते हैं ।

  •  सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से करोड़ गुना फल होता है । श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत (5 से 10 ग्राम {एक या दो चम्मच } का स्पर्श करके ‘ॐ नमो नारायणाय’ मंत्र का ‘आठ हजार जप’ करने के पश्चात ग्रहणशुद्धि होने पर उस घृत को पी ले । ऐसा करने से वह मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक् सिद्धि प्राप्त कर लेता है ।
  • सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए । बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं ।
  •  ग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक ‘अरुन्तुद’ नरक में वास करता है ।
  •  सूतक से पहले पानी में कुशा, तिल या तुलसी-पत्र डाल के रखें ताकि सूतक काल में उसे उपयोग में ला सकें । ग्रहणकाल में रखे गये पानी का उपयोग ग्रहण के बाद नहीं करना चाहिए किंतु जिन्हें यह सम्भव न हो वे उपरोक्तानुसार कुशा आदि डालकर रखे पानी को उपयोग में ला सकते हैं ।
  •  ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते । पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए ।
  •  ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए ।
  •  ग्रहण पूरा होने पर स्नान के बाद सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो उसका शुद्ध बिम्ब देखकर अर्घ्य दे कर भोजन करना चाहिए ।
  •  ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए । स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं ।
  •  ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए । ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा जमीन में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, (साधारण) बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है ।
  •  ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरूरतमंदों को वस्त्रदान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है ।
  • *ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ने चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिए व दंतधावन नहीं करना चाहिए
  •  ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन – ये सब कार्य वर्जित हैं ।
  •  ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए ।
  •  ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए ।

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