Durga Puja: नॉन-वेज को लेकर नई बहस, पूजा समितियों ने बताया अपना पक्ष
दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर शुरू हुई बहस अब दिल्ली तक पहुंच गई है। बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा दुर्गा...

Durga Puja : दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर शुरू हुई बहस अब दिल्ली तक पहुंच गई है। बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा दुर्गा पूजा के समय मांसाहार से दूरी बनाए रखने और पूजा पंडालों के आसपास नॉन-वेज की बिक्री रोकने की अपील के बाद दिल्ली की कई दुर्गा पूजा समितियों ने इस विचार का विरोध किया है। समितियों का कहना है कि मां दुर्गा को चढ़ाया जाने वाला भोग पूरी तरह सात्विक और शाकाहारी होता है, लेकिन पूजा स्थल के बाहर बंगाली समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक पसंद के अनुसार माछ-भात और मटन जैसे व्यंजन खाते हैं। उनका तर्क है कि इसे धार्मिक आस्था के साथ जोड़कर किसी समुदाय की खान-पान की परंपरा पर रोक लगाना उचित नहीं है। दिल्ली में हर साल बड़ी संख्या में दुर्गा पूजा आयोजन होते हैं। राजधानी में 350 से अधिक दुर्गा पूजा समितियां नवरात्र के दौरान अलग-अलग इलाकों में भव्य पंडाल तैयार करती हैं। समितियों से जुड़े लोगों का कहना है कि बंगाली समाज की परंपराओं को समझे बिना नॉन-वेज को लेकर टिप्पणी करना सही नहीं है और केवल किसी बयान के आधार पर वर्षों पुरानी परंपरा में बदलाव नहीं किया जाएगा।
मां दुर्गा के लिए सात्विक भोग, परिवार के लिए पारंपरिक खाना
चितरंजन पार्क को दिल्ली का ‘मिनी बंगाल’ भी कहा जाता है। यहां की मेला ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति के असिस्टेंट ट्रेजरर अधिक मित्रा ने बताया कि बंगाली समाज के लिए दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा पर्व है।उन्होंने कहा कि मान्यता के अनुसार इन पांच दिनों में मां दुर्गा को बेटी के रूप में मायके में आने वाली मां की तरह स्वागत किया जाता है। पूजा के दौरान मां को खिचड़ी, लूची, पायेश सहित अन्य सात्विक और शाकाहारी चीजों का भोग लगाया जाता है। उनके मुताबिक, इसके साथ ही पंडाल परिसर के बाहर परिवार और लोगों के लिए बंगाली खान-पान की पारंपरिक व्यवस्था होती है, जिसमें माछ-भात और मटन जैसे व्यंजन भी शामिल होते हैं। उनका कहना है कि यह बंगाली संस्कृति और खान-पान की पहचान का हिस्सा है।
‘बिना समझे टिप्पणी करना सही नहीं’
दिल्ली की अरामबाग दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष अभिजीत बोस ने भी नॉन-वेज को लेकर की गई अपील पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि अलग-अलग क्षेत्रों की धार्मिक परंपराओं को एक ही नजरिए से देखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि बंगाल की दुर्गा पूजा की परंपराएं उत्तर भारत की नवरात्रि परंपराओं से अलग हैं। बंगाल में कई स्थानों पर पूजा के दौरान बलि की भी परंपरा रही है, हालांकि दिल्ली में ऐसी परंपराएं आम तौर पर नहीं अपनाई जातीं। अभिजीत बोस के मुताबिक, दिल्ली में मां को फल और सब्जियों जैसी चीजों का प्रतीकात्मक रूप से अर्पण किया जाता है। वहीं, पूजा के भोग में प्याज और लहसुन तक का इस्तेमाल नहीं होता। लेकिन पंडाल के बाहर लगाए जाने वाले फूड स्टॉल में लोगों के लिए शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन उपलब्ध रहते हैं।
पूजा मंडप और बाहर के खान-पान में अंतर
मिलनी कल्चरल एंड वेलफेयर समिति की दुर्गा पूजा के अध्यक्ष मृणाल बिश्वास ने कहा कि पूजा के नियमों और पंडाल के बाहर होने वाली गतिविधियों को अलग-अलग समझने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि पूजा मंडप के भीतर खान-पान को लेकर विशेष धार्मिक मर्यादाओं का पालन किया जाता है। वहीं, मंडप से बाहर लोगों के लिए वेज और नॉन-वेज दोनों तरह के भोजन की व्यवस्था की जाती है। मृणाल बिश्वास ने कहा कि वह स्वयं शाकाहारी हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुर्गा पूजा के दौरान दूसरे लोगों की खान-पान की पसंद पर भी कोई पाबंदी लगा दी जाए। उनके अनुसार बंगाल की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने वहां के खान-पान को भी प्रभावित किया है और मछली बंगाली भोजन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पूरे भारत पर एक ही परंपरा लागू नहीं हो सकती
नई दिल्ली काली बाड़ी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रतो गांगुली ने भी नॉन-वेज को लेकर चल रही बहस को अनावश्यक बताया। उनका कहना है कि दिल्ली की दुर्गा पूजा समितियां इस विवाद में पड़ने के बजाय अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार आयोजन करेंगी। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में पूजा-पद्धति और परंपराएं अलग हैं। उत्तर भारत में नवरात्र के दौरान जिस तरह की धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं, उन्हें बंगाल या देश के अन्य हिस्सों की दुर्गा पूजा पर उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता। दुर्गा पूजा समितियों का कहना है कि पूजा के दौरान मां को दिया जाने वाला भोग सात्विक ही रहता है, लेकिन पंडाल के बाहर लोगों के पारंपरिक खान-पान को धार्मिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। समितियों ने साफ संकेत दिया है कि किसी बाहरी अपील के आधार पर बंगाली समाज की पारंपरिक खान-पान की संस्कृति में बदलाव नहीं किया जाएगा।









